मात्रा बाणी (श्री मात्रा साहिब)
जगद्गुरु श्री चन्द्राचार्य जी
ੴ सतिगुर प्रसादि
कहु रे बाल!
किस ने मूंडा किस ने मुंडाया,
किस का भेजा नगरी आया॥ 1॥
सद्गुरू मूंडा लेख मुंडाया,
गुरु का भेजा नगरी आया॥ 2॥
चेतहु नगरी तारहु गाम,
अलख पुरुष का सुमिरहु नाम॥ 3॥
गुरु अविनाशी खेल रचाया,
अगम निगम का पंथ बताया॥ 4॥
ज्ञान की गोदड़ी क्षिमा की टोपी,
यत् का आड़बन्द शील लंगोटी॥ 5॥
अकाल खिन्था निराश झोली,
युक्त का टोप गुरुमुखी बोली॥ 6॥
धर्म का चोला सत्य की सेली,
मर्याद मेखली लै गले में मेली॥ 7॥
ध्यान का बटुआ नृत की सूईदान,
ब्रह्म अंचला ले पहिरे सुजान॥ 8॥
बहरंगी मोरछड़ निर्लेप विष्टि,
निर्भव जंगडोरा ना को दृष्टि॥ 9॥
जाप जंगोटा सिफत उडाणी,
सिंगी शब्द अनाहद गुरुवाणी॥ 10॥
शर्म की मुद्रा शिव विभूता,
हरिभक्ति मृगानी लै पहिरे गुरुपूता॥ 11॥
संतोष सूत विवेक धागे,
अनेक तल्ली तहां लागे॥ 12॥
सुरत की सुई लै सद्गुरू सीवे,
जो राखे सो निर्भव थीवे॥ 13॥
स्याह सफ़ैद ज़र्द सुरखाई,
जो लै पहिरे सो गुरु भाई॥ 14॥
त्रैगुण चकमक अग्नि मथि पाई,
दु:ख सुख धूनि देहि जलाई॥ 15॥
संयम कृपाली शोभाधारी,
चरण कमल में सुरति हमारी॥ 16॥
भाव भोजन अमृत कर पाया,
भला बुरा मन नहीं बसाया॥ 17॥
पात्र विचार फरुआ बहुगुणा,
करमंडल तूम्बा किस्ती घणा॥ 18॥
अमृत प्याला उदक मन दिया,
जो पीवे सो शीतल भया॥ 19॥
इड़ा में आवे पिंगला में धावे,
सुषुम्न के घर सहज समावे॥ 20॥
निराश मठ निरन्तर ध्यान,
निर्भव नगरी गुरु दीपक ज्ञान॥ 21॥
स्थिर ऋद्धि अमर पद दण्डा,
धीरज फहुड़ी तपकर खण्डा॥ 22॥
वश कर आसा समदृष्टि चौगान,
हर्ष शोक नहीं मन में आन॥ 23॥
सहज बैरागी करे विराग,
माया मोहिनी सकल त्याग॥ 24॥
नाम की पाखर पवन का घोड़ा,
निःकर्मजीन तत्व का जोड़ा॥ 25॥
निर्गुण ढाल गुरु शब्द कमान,
अकल संजोह प्रीति के बाण॥ 26॥
अकल की बरछी गुणों की कटारी,
मन को मार करो असवारी॥ 27॥
विषम गढ़ तोड़ निर्भव घर आया,
नौबत शंख नगारा बाया॥ 28॥
गुरु अविनाशी सूषम वेद,
निर्वाण विद्या अपार भेद॥ 29॥
अखण्ड जनेऊ निर्मल धोती,
सोहं जप सच्च माल परोती॥ 30॥
शिक्षा गुरुमन्त्र गायत्री हरिनाम,
निश्चल आसन कर विश्राम॥ 31॥
तिलक सम्पूर्ण तर्पण यश,
पूजा प्रेम भोग महारस॥ 32॥
निर्वैर संध्या दर्शन छापा,
वाद-विवाद मिटावे आपा॥ 33॥
प्रीति पितांबर मन मृगशाला,
चीत चितम्बर रुंझुन माला॥ 34॥
बुद्धि विघम्बर कुलह पोस्तीन,
खौंस खड़ाऊं इह मति लीन॥ 35॥
तोड़ा चूड़ा और जंजीर,
लै पहिरे उदासी फकीर॥ 36॥
जटा जूट मुकुट सिर होई,
मुक्ता फिरे बन्ध नहि कोई॥ 37॥
नानकपूता श्री चन्द्र बोले,
जुगत पछाणे तत्व विरोले॥ 38॥
ऐसी मात्रा लै पहिरे कोई,
आवागमन मिटावे सोई॥ 39॥