गदौरी साहिब

गुरुद्वारा गदौरी साहिब बाबा श्री चन्द्र साहिब जी का पवित्र तप-स्थान है। यह हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू में भुन्तर से 3 कि.मी. की दूरी पर P.W.D. वर्कशाप से 200 मीटर दूर गांव गदौरी में स्थित है। सुन्दर पहाड़ों की गोद में प्राकृतिक नज़ारों के बीच में स्थित इस गुरुद्वारे की छटा देखते ही बनती है।

संवत् 1700 विक्रमी में महाराज श्री चन्द्र जी ने इस धरती को अपने पवित्र चरण कमलों से छुआ था। आप जी ने 22 दिन तक लगातार समाधी में रहकर इस धरती को पावन कर दिया। यहां सुनहरी शिला के ऊपर बाबा जी ने तपस्या की और इसी शिला में चिमटा गाढ़ कर निर्मल जल प्रकट किया। आज ये जगह बावली साहिब के नाम से जानी जाती है। इसी के साथ ही धूणा साहिब है जिसमें संवत् 1700 से विभूति आज भी सुरक्षित और सुशोभित है। महाराज जी का सामान आज यहां पूर्ण रूप से सुरक्षित है।

आज भी महाराज श्री चन्द्र जी का यहां इस धरती पर आगमन होता है और उनसे जुड़ी हुई संगत उनके भव्य रूप के दर्शन करती है। यहां कदम-कदम पर इतने चमत्कार होते हैं कि हमेशा महाराज जी के आसपास होने का अहसास बना रहता है। जो भी संगत यहां श्रद्धापूर्वक आती है, यहां के चमत्कार देखकर अपार श्रद्धा लेकर वापिस जाती है।

महाराज जी का यह स्थान जहां उन्होंने समाधि लगाई थी धरती से 8 फुट नीचे था। स्वयं महाराज जी ने स्वामी दयानन्द जी को सपने में दर्शन देकर और आदेश देकर प्रेरणा दी व खुदाई करवाई जिससे धीरे-धीरे वो सामान प्रकट हुआ और दुनिया के सामने आया। आज यो सारा सामान भौरा साहिब में प्रेम पूर्वक सुशोभित है जिन का वर्णन इस प्रकार है।

गुरुद्वारा गदौरी साहिब

1. भौरा साहिब

यह गुरूद्वारा साहिब से 13 सीढ़ियां नीचे उतर कर है। इसमें सामने ही शिला है जो सोने की तरह चमकती है और छूने पर हाथ भी सुनहरे हो जाते हैं। शिला के इस रूप का दर्शन उन्हीं को होता है जिन पर महाराज की विशेष कृपा रहती है अन्यथा संगत को यह एक साधारण शिला ही नज़र आती है। इसी शिला पर महाराज जी ने समाधि लगाई थी। सबसे विचित्र बात इस शिला के कोने में महाराज श्री चन्द्र जी के पवित्र चरणों की छाप आज भी मौजूद है।

2. धूणा साहिब

महाराज जी का पावन धूणा साहिब पवित्र शिला के ऊपर ही है। इसमें उस समय की विभूति सुरक्षित है जब बाबा जी 1700 विक्रमी में आए थे और धूणा लगाया था। यह कोई साधारण विभूति नहीं है। इसे खाने से और मलने से सभी शारीरिक और मानसिक रोग खत्म हो जाते हैं। चखने में साधारण से स्वाद वाली ये विभूति कई श्रद्धालुओं को कड़वेपन और मीठेपन का अहसास भी कराती है।

3. पवित्र चिमटा

पवित्र शिला के बीच में बाबा श्री चन्द्र महाराज जी ने अपने हाथों से चिमटा गाढ़ा हुआ है। यह किसी के हिलाने से नहीं हिलता, न ही इसे बाहर निकाल सकते हैं।

4. बावली साहिब

यह पवित्र शिला के दायीं तरफ है। महाराज जी ने शिला पर चिमटा गाढ़कर नीचे से जल प्रकट किया था और बावली साहिब में जल पवित्र शिला से ही आ रहा है। वैसे जल धरती से 200 फुट नीचे था पर बाबा जी की कृपा से 8 फुट खोदने पर ही प्रकट हो गया। यह जल कभी भी सूखता नहीं है। गुरुद्वारे में लंगर, कडाह-प्रसाद बनाने में इसी अमृत का उपयोग करते हैं। इस जल के पान करने से अनेक बीमारियों से छुटकारा मिलता है।

5. चरण पादुका

यह लकड़ी की खड़ावां के रूप में हैं और सुनहरे भूरे रंग की हैं व बिल्कुल हल्की हैं। अति प्राचीन होने पर भी धरती में रहने के बावजूद आज भी ये पूर्णतया सुरक्षित हैं।

6. सिमरना

ये रुद्राक्ष का है और इसमें सुनहरे भूरे 27 मणके हैं। बाबा जी इसी से सिमरन किया करते थे। देखते ही देखते इसका रंग एकदम सुनहरी हो जाता है और चमकने लगता है।

7. जटाओं के सुनहरी बाल

बाबा जी के कुछ बाल जो बिलकुल सुनहरी हैं पूर्णतया सुरक्षित रखे गये हैं।

8. मिट्टी का बर्तन

इस प्राचीन बर्तन में बाबा जी लंगर तैयार करते थे। यह एक तरफ से काला हो चुका है। आज भी इसे चावल से भर दिया जाता है और ये अपने आप खाली हो जाता है या कम आधा हो जाता है। इसको फिर से भर देते हैं। आज इसी की बरकत से गुरुद्वारे का लंगर चला हुआ है।

9. बड़ी बावली साहिब

महाराज श्री चन्द्र जी की अपार कृपा से यहां सेवा कर रहे स्वामी दयानन्द जी महाराज जी को एक दिन बहुत अद्भुत दृष्टांत हुआ। उनके अनुसार बाबा श्री चन्द्र जी का हुक्म था कि एक बड़ी बावली साहिब का निर्माण होना चाहिए, जिसके जल से संगत स्नान भी कर सके और इस बावली तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां होनी चाहिएं।

महाराज जी के आदेशानुसार सेवा शुरू हो गई और बाबा जी ने कड़े नियमों का पालन करते हुए और संगत से करवाते स्थान को तैयार किया। इस जगह की सेवा सारी संगत ने हमेशा बड़ी स्वच्छता और सुच्चम से की। नहां धोकर स्वच्छ कपड़े पहन कर, सिर ढक कर, नंगे पैर इस स्थान की सेवा की गई, चाहे बरसात हो, सर्दी हो या कैसा भी मौसम हो सारी संगतों ने बढ़ चढ़ कर इस सेवा में हिस्सा लिया और कई करिश्मे भी देखे।

आज ये बावली साहिब बनकर तैयार हो चुकी है। इसमें इतना महात्म है कि 84 सीढ़ियां उतरकर जब संगत यहां पहुंचती है तो अपनी 84 लाख योनियों से मुक्ति पाती है। इसका जल भी अन्दर से पवित्र शिला के नीचे से आ रहा है। इसके सेवन से कैंसर तक के रोगी ठीक हो रहे हैं। हर तरह की बीमारियों से यह जल छुटकारा दिलाता है। सबसे खास बात यह कि यह जल एक ही समय में तीन रंग बदल लेता है और तीन अलग अलग स्वाद भी देता है। बाबा जी के अनुसार गंगा, यमुना और सरस्वती - इन तीनों नदियों का पवित्र संगम इसी बावली साहिब में है।

ये सब महाराज श्री चन्द्र जी द्वारा स्पर्श किया हुआ सामान है जो यहां सेवा कर रहे संत बाबा स्वामी दयानन्द जी ने बड़ी निष्ठा, प्रेम व श्रद्धा से संभाल कर रखा है। बाबा जी के असीम प्रयास, मेहनत और लगन से ही यह गुरुद्वारा दिन दुगनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा है। महाराज जी की यहां संत बाबा स्वामी दयानन्द जी के ऊपर विशेष कृपा है, यह बात उन्हें मिलने के बाद ही जानी जा सकती है।

धन्य है यो संगत जो नित्य प्रति बाबा जी के साथ रहती है। उनके द्वारा किये गये कार्यों में सहयोग करती है। उनके दर्शन करती है और उनके प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त करती है। ऐसी संगत को शत् शत् प्रणाम।