श्री चन्द्र चालीसा
बाबा श्री चन्द जी महाराज की स्तुति
दोहा
"श्री गुरु चरण सरोज रज बन्दो वार वार,
वरणों श्री चन्द विमल, यश विपती विदारणहार।
सच्चिदानन्द स्वरूप हो गुरु नानक के पुत,
मेरी डंडौत है आपको लाखों हो अवधूत।।"
चौपाई
जै जै जै श्री चन्द्र गुरूजी,
यम के काटो फन्द गुरूजी।
जै जै नानक अगन बिहारी,
मंगल भवन अमंगल हारी।
बिगड़ी बनाने नाम श्री चन्द्र, श्री सिमरन से शोभा पावे,
शीतल शान्ति चन्द प्रगटावे।
दुब दस वर्ष राम वनवासी,
आप तपो निध जन्म उदासी।
मूल वैराग की मूरत तेरी,
काटे ममता करे न देरी।
माया विच उदास बनाये,
दिल में दिव्य प्रकाश दिखाये।
एक हाथ में आठो सिद्धिया,
दुजे धरो नौ निधियां।
चरण तेरे मुक्ति के दाते,
आवा गमन से जीव छुड़ाते।
शंकर शम शिप्र वरदाता,
एक मांगे याचक दस पाता।
ऊंची शान तपधारी तेरी,
कलयुग में मुख्तयागी तेरी।
परमहंस सब पंख तुम्हारा,
मैं लालच का रोगी भारा।
मांगु भोग भोख भी देना,
संकट कष्ट सब हर देना।
तप करते तुम विश्व के कारण,
परम त्यागी उदम उदारण।
देता ध्यान तेरी पद निश्चय,
धर न सके मेरा चित चंचल।
दिन बन्धु दिव्य शक्ति दिजे,
चरण कमल की भक्ति दिजे।
सिंह की छाल बिछाने वाले,
अटल समाधि लगाने वाले।
भेंट करूं धन्यवाद आपकी,
लूंगा आशीर्वाद आपकी।
अपना समझ करो अल्प गता,
आकृतघन को दे सर्वगता।
भरे मेरे मन अवगुण दुःखन,
दुर करो सुरज कुल भूखन।
नमो: नमो: ब्रह्मचारी बालक,
सम्प्रदा निर्माण के मालकं।
विषय भोग विश्व केतु लजानो,
सुखम रूप सब विश्व को मानो।
तुम्बा रखते पास त्यागी,
मन में दिव्य प्रकाश त्यागी।
मुख से गाते सतकरतार,
भारत बेड़ा करते पार।
भजन तेरा काटे भव सुला,
प्रेम पुष्प सौ भाग का मुल्ला।
पतित पावन गुरु जग निःसतारण शरणागत,
वत्सन दुःख तारण।
गुरु प्रकाश श्री चन्द्र शरणम्,
तारक मन्त्र भव हरणम्।
जिस पर कृपा रट सकता सो,
जन्म मरण दुःख कट सकता सो।
आपके मन्दिर जो जन जाता,
पग-पग में यज्ञ का फल पाता।
भोग लगा खाये प्रसादी,
संचित कर्म से मिले आज़ादी।
मूर्ति पूजा धर्म सनातन,
सतियुग साधन हुआ पुरातन।
प्रकट किता उदासी भेख,
कलयुग के भी काटे कलेश।
भाव का भूखा इष्ट को कहते,
सबके मन मन्दिर में रहते।
पंखा ध्यान से करूं तुम्हारा,
पूजन ज्ञान से करूं तुम्हारा।
मन निमा मत ऊंची मेरी,
कर सतगुरू शरणागत तेरी।
गुरूआई लेने नहीं आये,
करामात का घर कहलाये।
प्रेम पिता का पास तुम्हारो,
अंगद भिखक दास तुम्हारो।
वंश गुरु की पूज करूं मैं,
सब को सम शशि दुज कहूं मैं।
इष्ट शिरोमणि श्री चन्द्र स्वामी,
घट-घट के गुरु अन्तर्यामी।
द्वारे के भिखारी सूर सब,
सेवक होते आपके गुरू सब।।
"सम्पूर्ण"
सतगुरू प्रसाद।।