स्वामी दयानंद जी महाराज
इस पुण्य तप-स्थान की खोज पूजनीय स्वामी दयानन्द जी ने की है। इनका जन्म कुल्लू के गदौरी गांव में हुआ था और ये हिन्दू परिवार के थे। शिक्षा के दौरान किशोरावस्था में इनको बाबा श्रीचन्द जी की साक्षात दर्शन हुए और वचन भी हुए कि "मैं गुरू नानक देव जी का बड़ा सुपुत्र हूँ, यहां मेरी जगह है और उस जगह को प्रकट करना है"। बाबा जी ने गुरु नानक देव जी के बारे में अपनी स्कूल की किताब में ही पढ़ा था और इसके अलावा कुछ नहीं जानते थे। बाबा जी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और कालेज पढ़ने चले गए। फिर पूरी रात सो नहीं पाये। सारी रात खुद को संतों के रूप में देखते रहे और सुबह हो गई। ये सब कई दिन तक चलता रहा। इन्होंने कालेज में पेपर भी दे दिए। जब नतीजा सामने आया तो पता चला कि वह उनकी किसी भी पेपर में हाज़िरी मौजूद नहीं थी।
फिर बाबा जी को दुबारा दर्शन हुए और आदेश हुआ कि मान जाओ और इस जगह को प्रकट करो। परमात्मा ने उन्हें इस जगह के दर्शन कराये और इसी धरती से जोत के दर्शन हुए। वास्तव में इस जगह खेत थे। इस बात का पता लगने पर 1988 में यह जगह बाबा श्री चन्द्र जी के नाम कर दी गई। इस किस्से को देखकर बाबा जी के मन में बैराग आ गया और 17 साल की उम्र में इन्होंने परिवार का मोह त्याग कर इस जगह पर टेंट लगा लिया। घर से बिना कुछ लिये खाली हाथ बाबा जी ने यहां रहना शुरू कर दिया।
परमात्मा का हुक्म था कि मेरा रंग पहनो लेकिन बाबा जी को मालूम ही नहीं था कि बाबा श्री चन्द्र जी का रंग कौन सा है। इसलिए बाबा जी अपने साधारण कपड़े ही पहन लेते। कुछ समय बाद सारे कपड़े कैंची से कतरे हुए मिलने लगे। किसी बुज़ुर्ग ने कहा इनके लिए भगवे कपड़े मंगवाओ। उस दिन से बाबा जी ने भगवा वेश धारण कर लिया। फिर बाबा जी को हुकुम हुआ कि केश भी रखने हैं लेकिन ये नहीं माने और जबरदस्ती बाल कटवाने बैठ गये, देखो ईश्वर की कुदरत दोनों कैंची और कैंची सर पर रखते ही टुकड़े-टुकड़े हो गई। उसके बाद बाबा जी ने बाल रख लिए और आज बाबा जी के केश जटाओं के रूप में 7 फुट के आसपास हैं। इस तरह बाबा जी 14 वर्ष तक कड़ी परीक्षाओं से गुजरते रहे।
फिर बाबा जी को हुकम हुआ कि यहां गुरु ग्रन्थ साहिब का प्रकाश किया जाए लेकिन बाबा जी को गुरुमुखी नहीं आती थी। जब प्रकाश किया गया तो बाबा जी को आलौकिक नज़ारों के दर्शन हुए और अपने आप ही गुरुमुखी पढ़नी आ गई। इतनी कृपा हो गई कि बाबा जी ने सारे पाठ पंजाबी में ही करने शुरू कर दिए।
1989 में बाबा जी ने यहां गुरुद्वारे के पास धूणा लगाया था। एक बार फिर बाबा जी को दुबारा दर्शन हुए कि यहां प्राचीन स्थान है जो मिट्टी के 8 फुट नीचे है और जहां धूणा है उसके कोने में है। जिस जगह यह स्थान था, उस जगह से 20 अगस्त 2000 को सारी संगत को जोत के दर्शन हुए। वही जोत जो पिछले काफी समय से बाबा जी को दर्शन देती थी। वास्तव में यह जोत मिट्टी के बीच सिमरने की थी। सारी संगत ने जोत के दर्शन किए और मिट्टी को प्रसाद स्वरूप अपने घरों में ले गये। जिसकी चमक आज भी कायम है। यह चमक सिमरने के मणने की थी और इसके प्रभाव से सारी धरती चमक उठी। जो भी मत्था टेकते उनके मत्थे भी चमक गये।
मणीकर्ण से परम पूजनीक देवा जी महराज जी की अपार कृपा से इस स्थान की कार सेवा शुरू हो गई। ये जगह जहां आठा भैरा साहिब है बाबा जी ने पत्थर की चिनाई करके बन्द कर दिया था और हुक्म था जब इस गांव में बहुत जुल्म बढ़ जायेगा तो ये स्थान प्रकट होगा। इस स्थान की सेवा संत बाबा लाभ सिंह जी किला आनंदगढ़ साहिब वालों के उदम से 7 सितम्बर 2003 को शुरू हुई। इस सेवा में मणीकर्ण साहिब से पूजनीक देवा जी महराज, कुल्लू, भुन्तर और मण्डी की संगत अपना भरपूर सहयोग दे रही है और आज गुरुद्वारा साहिब की 2 मंजिला इमारत तैयार होने को है। लंगर हाल का निर्माण भी हो चुका है। बाहर से आई संगत के लिए भी कमरों का निर्माण जारी है।
नित्य नियम
गुरुद्वारे में रोज का नित्य नियम अमृत वेले आसा दी वार का कीर्तन 6 बजे से आरम्भ होता है, 8 बजे आरती के साथ ही भोग डालकर समाप्ति करते हैं। शाम को रहिरास साहिब का पाठ, कीर्तन व आरती होती है। रविवार को सुबह सुन्दर दीवान सजता है और महाराज जी स्वयं आकर संगतों को निहाल करते हैं। और उनके संसारिक दुःखों को दूर करते हुए उनको जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त करते हैं।
यहां सारे गुरुपुरव बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं लेकिन 2 पर्वों की खास महता है।
1. सालाना दिवस
यह पर्व अगस्त महीने के पहले हफ्ते शनिवार और रविवार को मनाया जाता है।
2. बाबा श्री चन्द्र जी का प्रकाश उत्सव
यह मेला सितम्बर में मनाया जाता है जिसमें बाहर से रागी जत्थे बुलाये जाते हैं। देश प्रदेश से संगत आती है और महाराज जी के घर की खुशियां प्राप्त करते हैं।
संगतों के ठहरने, खाने की सारी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है। गांव की गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी गुरुद्वारे का सारा हिसाब-किताब रखती है। हर रविवार को लंगर होता है जिसकी सेवा संगत निःस्वार्थ रूप से करती है।